श्री गणेश जी का जन्म कथा

Shree Ganesh Ji Ka Janam Katha Hindi

श्री गणेश जी के जन्म

श्रीगणेश माता पार्वती और शिवजी के बेटे हैं। इनके जन्म को लेकर कई तरह की कथाएं हैं। वराहपुराण और शिवपुराण में विनायक के जन्म को लेकर अलग-अलग कथाएं हैं।
1. वराहपुराण के मुताबिक भगवान शिव ने गणेशजी को पचंतत्वों से बनाया है। जब भगवान शिव गणेश जी को बना रहे थे तो उन्होंने विशिष्ट और अत्यंत रुपवान रूप पाया। इसके बाद यह खबर देवताओं को मिली। देवताओं को जब गणेश के रूप और विशिष्टता के बारे में पता लगा तो उन्हें डर सताने लगा कि कहीं ये सबके आकर्षण का केंद्र ना बन जाए। इस डर को भगवान शिव भी भांप गए थे, जिसके बाद उन्होंने उनके पेट को बड़ा कर दिया और मुंह हाथी का लगा दिया।
2. वहीं शिवपुराण में कथा इससे अलग है। इसके मुताबिक माता पार्वती ने अपने शरीर पर हल्दी लगाई थी, इसके बाद जब उन्होंने अपने शरीर से हल्दी उबटन उतारी तो उससे उन्होंने एक पुतला बना दिया। पुतले में बाद में उन्होंने प्राण डाल दिए। इस तरह से विनायक पैदा हुए थे। इसके बाद माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिए कि तुम मेरे द्वार पर बैठ जाओ और उसकी रक्षा करो, किसी को भी अंदर नहीं आने देना।
कुछ समय बाद शिवजी घर आए तो उन्होंने कहा कि मुझे पार्वती से मिलना है। इस पर गणेश जी ने मना कर दिया। शिवजी को नहीं पता था कि ये कौन हैं। दोनों में विवाद हो गया और उस विवाद ने युद्ध का रूप धारण कर लिया। इस दौरान शिवजी ने अपना त्रिशूल निकाला और गणेश का सिर काट डाला।
पार्वती को पता लगा तो वह बाहर आईं और रोने लगीं। उन्होंने शिवजी से कहा कि आपने मेरे बेटा का सिर काट दिया। शिवजी ने पूछा कि ये तुम्हारा बेटा कैसे हो सकता है। इसके बाद पार्वती ने शिवजी को पूरी कथा बताई। शिवजी ने पार्वती को मनाते हुए कहा कि ठीक है मैं इसमें प्राण डाल देता हूं, लेकिन प्राण डालने के लिए एक सिर चाहिए। इस पर उन्होंने गरूड़ जी से कहा कि उत्तर दिशा में जाओ और वहां जो भी मां अपने बच्चे की तरफ पीठ कर के सोई हो उस बच्चे का सिर ले आना। गरूड़ जी भटकते रहे पर उन्हें ऐसी कोई मां नहीं मिली क्योंकि हर मां अपने बच्चे की तरफ मुंह कर के सोती है। अंतत: एक हथिनी दिखाई दी। हथिनी का शरीर का प्रकार ऐसा होता हैं कि वह बच्चे की तरफ मुंह कर के नहीं सो सकती है। गरूड़ जी उस शिशु हाथी का सिर ले आए। भगवान शिवजी ने वह बालक के शरीर से जोड़ दिया। उसमें प्राणों का संचार कर दिया। उनका नामकरण कर दिया। इस तरह श्रीगणेश को हाथी का सिर लगा।

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कैसे जन्मे ब्रह्मा और रुद्र

Bhagwan Brahma Ki Janam Katha

कैसे जन्मे ब्रह्मा और रुद्र

शिवपुराण के अनुसार ब्रह्माजी अपने पुत्र नारदजी से कहते हैं कि विष्णु को उत्पन्न करने के बाद सदाशिव और शक्ति ने पूर्ववत प्रयत्न करके मुझे (ब्रह्माजी को) अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया और तुरंत ही मुझे विष्णु के नाभि कमल में डाल दिया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में मुझ हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) का जन्म हुआ।
मैंने (ब्रह्मा) उस कमल के सिवाय दूसरे किसी को अपने शरीर का जनक या पिता नहीं जाना। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मेरा क्या कार्य है, मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूं और किसने इस समय मेरा निर्माण किया है? इस प्रकार में संशय में पड़ा हूं।
इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन 3 देवताओं में गुण हैं और सदाशिव गुणातीत माने गए हैं। एक बार ब्रह्मा और विष्‍णु दोनों में सर्वोच्चता को लेकर लड़ाई हो गई, तो बीच में कालरूपी एक स्तंभ आकर खड़ा हो गया। तब दोनों ने पूछा- ‘प्रभो, सृष्टि आदि 5 कर्तव्यों के लक्षण क्या हैं? यह हम दोनों को बताइए।’
तब ज्योतिर्लिंग रूप काल ने कहा- ‘पुत्रो, तुम दोनों ने तपस्या करके मुझसे सृष्टि (जन्म) और स्थिति (पालन) नामक दो कृत्य प्राप्त किए हैं। इसी प्रकार मेरे विभूतिस्वरूप रुद्र और महेश्वर ने दो अन्य उत्तम कृत्य संहार (विनाश) और तिरोभाव (अकृत्य) मुझसे प्राप्त किए हैं, परंतु अनुग्रह (कृपा करना) नामक दूसरा कोई कृत्य पा नहीं सकता। रुद्र और महेश्वर दोनों ही अपने कृत्य को भूले नहीं हैं इसलिए मैंने उनके लिए अपनी समानता प्रदान की है।’
सदाशिव कहते हैं- ‘ये (रुद्र और महेश) मेरे जैसे ही वाहन रखते हैं, मेरे जैसा ही वेश धरते हैं और मेरे जैसे ही इनके पास हथियार हैं। वे रूप, वेश, वाहन, आसन और कृत्य में मेरे ही समान हैं।’
कालरूपी सदाशिव कहते हैं कि मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ओंकार के रूप में प्रसिद्ध है, क्योंकि सबसे पहले मेरे मुख से ओंकार अर्थात ‘ॐ’ प्रकट हुआ। ओंकार वाचक है, मैं वाच्य हूं और यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है और यह मैं ही हूं। प्रतिदिन ओंकार का स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है। मेरे पश्चिमी मुख से अकार का, उत्तरवर्ती मुख से उकार का, दक्षिणवर्ती मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से विन्दु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। यह 5 अवयवों से युक्त (पंचभूत) ओंकार का विस्तार हुआ।
अब यहां 7 आत्मा हो गईं- ब्रह्म (परमेश्वर) से सदाशिव, सदाशिव से दुर्गा। ‍‍सदाशिव-दुर्गा से विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, महेश्वर। इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश के जन्मदाता कालरूपी सदाशिव और दुर्गा हैं। ये बातें अन्य पुराणों में घुमा-फिराकर लिखी गई हैं जिससे कि भ्रम की उत्पत्ति होती है। भ्रम को छोड़कर सभी पुराण और वेदों को पढ़ने की चेष्टा करें तो असल में समझ में आएगा। मनगढ़ंत लोकमान्यता के आधार पर अधिकतर हिन्दू सच को नहीं जानते हैं।

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श्री विष्णु भगवान का जन्म कैसे हुआ

Bhagwan Vishnu ki janam katha Hindi

श्री विष्णु भगवान का जन्म कहानी

ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश के संबंध में हिन्दू मानस पटल पर भ्रम की स्थिति है। वे उनको ही सर्वोत्तम और स्वयंभू मानते हैं, लेकिन क्या यह सच है? क्या ब्रह्मा, विष्णु और महेश का कोई पिता नहीं है? वेदों में लिखा है कि जो जन्मा या प्रकट है वह ईश्‍वर नहीं हो सकता। ईश्‍वर अजन्मा, अप्रकट और निराकार है। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म ही सत्य है वही अविकारी परमेश्‍वर है। जिस समय सृष्टि में अंधकार था। न जल, न अग्नि और न वायु था तब वही तत्सदब्रह्म ही था जिसे श्रुति में सत् कहा गया है। सत् अर्थात अविनाशी परमात्मा।
उस अविनाशी परब्रह्म (काल) ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की। उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्तिरहित परम ब्रह्म है। परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म। परम अक्षर ब्रह्म। वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है। अर्वाचीन और प्राचीन विद्वान उन्हीं को ईश्‍वर कहते हैं। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने विग्रह (शरीर) से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है।
वह शक्ति अम्बिका (पार्वती या सती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेवजननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या और मूल कारण भी कहते हैं। सदाशिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं। पराशक्ति जगत जननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है।एकाकिनी होने पर भी वह माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है। उस शक्ति की देवी ने ही लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती के रूप में जन्म लिया और उसने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से विवाह किया था। तीन रूप होकर भी वह अकेली रह गई थी। उस कालरूप सदाशिव की अर्धांगिनी है दुर्गा।
उस कालरूपी ब्रह्म सदाशिव ने एक ही समय शक्ति के साथ ‘शिवलोक’ नामक क्षेत्र का निर्माण किया था। उस उत्तम क्षेत्र को ‘काशी’ कहते हैं। वह मोक्ष का स्थान है। यहां शक्ति और शिव अर्थात कालरूपी ब्रह्म सदाशिव और दुर्गा यहां पति और पत्नी के रूप में निवास करते हैं।
इस मनोरम स्थान काशीपुरी को प्रलयकाल में भी शिव और शिवा ने अपने सान्निध्य से कभी मुक्त नहीं किया था। इस आनंदरूप वन में रमण करते हुए एक समय शिव और शिवा को यह इच्‍छा उत्पन्न हुई ‍कि किसी दूसरे पुरुष की सृष्टि करनी चाहिए, जिस पर सृष्टि निर्माण (वंशवृद्धि आदि) का कार्यभार रखकर हम निर्वाण धारण करें।
ऐसा निश्‍चय करके शक्ति सहित परमेश्वररूपी शिव ने अपने वामांग पर अमृत मल दिया। फिर वहां से एक पुरुष प्रकट हुआ। शिव ने उस पुरुष से संबोधित होकर कहा, ‘वत्स! व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम ‘विष्णु’ विख्यात होगा।’
इस प्रकार विष्णु के माता और पिता कालरूपी सदाशिव और पराशक्ति दुर्गा हैं।

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श्री नारायण कवच – हिंदी

Shri Narayan Kavach in Hindi

Shri Narayan Kavach

श्री नारायण कवच

।।राजोवाच।।
यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।१
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।
ततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।२
।।श्रीशुक उवाच।।
वृतः पुरोहितोस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु।।३
विश्वरूप उवाचधौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।४
नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि।।५
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा।।६
करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारन्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु।।७
न्यसेद् हृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्।।८
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः।।९
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति ।।१०
आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत ।।११
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान् दधानोsष्टगुणोsष्टबाहुः ।।१२
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोsव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ।।१३
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ।।१४
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोsव्याद् भरताग्रजोsस्मान् ।।१५
मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ।।१६
सनत्कुमारो वतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।।१७
धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ।।१८
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्किः कले कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ।।१९
मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ।।२०
देवोsपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोsवतु पद्मनाभः ।।२१
श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ।।२२
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ।।२३
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ।।२४
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ।।२५
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि।
चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् २६
यन्नो भयं ग्रहेभ्यो भूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ।।२७
सर्वाण्येतानि भगन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ।।२८
गरूड़ो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ।।२९
सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धिन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ।।३०
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सद्सच्च यत्।
सत्यनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपाद्रवाः ।।३१
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ।।३२
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ।।३३
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन ग्रस्तसमस्ततेजाः ।।३४
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारयणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ।।३५
एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ।।३६
न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ।।३७
इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरूधन्वनि ।।३८
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथः स्त्रीर्भिवृतो यत्र द्विजक्षयः ।।३९
गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ।।४०
।।श्रीशुक उवाच।।
य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ।।४१
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्यऽमृधेसुरान् ।।४२
।।इति श्रीनारायणकवचं सम्पूर्णम्।।

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शिवकवचम् हिंदी में

Shiva Kavach in Hindi


श्रीशिवकवचम्
श्रीशिवकवचम्

अस्य श्री शिवकवच स्तोत्रमहामन्त्रस्य
ऋषभयोगीश्वर ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः । श्रीसाम्बसदाशिवो देवता ।

ॐ बीजम् ।
नमः शक्तिः ।
शिवायेति कीलकम् ।
मम साम्बसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।

करन्यासः
ओं सदाशिवाय अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
नं गंगाधराय तर्जनीभ्यां नमः ।
मं मृत्युञ्जयाय मध्यमाभ्यां नमः ।
शिं शूलपाणये अनामिकाभ्यां नमः ।
वां पिनाकपाणये कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
यं उमापतये करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादि अंगन्यासः
ओं सदाशिवाय हृदयाय नमः ।
नं गंगाधराय शिरसे स्वाहा ।
मं मृत्युञ्जयाय शिखायै वषट् ।
शिं शूलपाणये कवचाय हुम् ।
वां पिनाकपाणये नेत्रत्रयाय वौषट् ।
यं उमापतये अस्त्राय फट् ।
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥

ध्यानम्
वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं कालकण्ठ मरिंदमम् ।
सहस्रकरमत्युग्रं वन्दे शम्भुं उमापतिम् ॥
रुद्राक्षकङ्कणलसत्करदण्डयुग्मः
पालान्तरालसितभस्मधृतत्रिपुण्ड्रः ।
पञ्चाक्षरं परिपठन् वरमन्त्रराजं
ध्यायन् सदा पशुपतिं शरणं व्रजेथाः ॥
अतः परं सर्वपुराणगुह्यं
निःशेषपापौघहरं पवित्रम् ।
जयप्रदं सर्वविपत्प्रमोचनं
वक्ष्यामि शैवम् कवचं हिताय ते ॥

पञ्चपूजा
लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि ।
हं आकाशात्मने पुष्पैः पूजयामि ।
यं वाय्वात्मने धूपम् आघ्रापयामि ।
रं अग्न्यात्मने दीपं दर्शयामि ।
वं अमृतात्मने अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि ।
सं सर्वात्मने सर्वोपचारपूजां समर्पयामि ॥
ऋषभ उवाच —
नमस्कृत्य महादेवं विश्वव्यापिनमीश्वरम् ।
वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥ १॥
शुचौ देशे समासीनो यथावत्कल्पितासनः ।
जितेन्द्रियो जितप्राणश्चिन्तयेच्छिवमव्ययम् ॥ २॥
हृत्पुण्डरीकान्तरसन्निविष्टं
स्वतेजसा व्याप्तनभोऽवकाशम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममनन्तमाद्यं
ध्यायेत् परानन्दमयं महेशम् ॥ ३॥
ध्यानावधूताखिलकर्मबन्ध-
श्चिरं चिदानन्दनिमग्नचेताः ।
षडक्षरन्यास समाहितात्मा
शैवेन कुर्यात्कवचेन रक्षाम् ॥ ४॥
मां पातु देवोऽखिलदेवतात्मा
संसारकूपे पतितं गभीरे ।
तन्नाम दिव्यं परमन्त्रमूलं
धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम् ॥ ५॥
सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्ति-
र्ज्योतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा ।
अणोरणीयानुरुशक्तिरेकः
स ईश्वरः पातु भयादशेषात् ॥ ६॥
यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं
पायात्स भूमेर्गिरिशोऽष्टमूर्तिः ।
योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति
संजीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥ ७॥
कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा
सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः ।
स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्ने-
र्वात्यादिभीतेरखिलाच्च तापात् ॥ ८॥
प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो
विद्यावराभीतिकुठारपाणिः ।
चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः
प्राच्यां स्थितो रक्षतु मामजस्रम् ॥ ९॥
कुठारखेटाङ्कुशशूलढक्का-
कपालपाशाक्षगुणान्दधानः ।
चतुर्मुखो नीलरुचिस्त्रिनेत्रः
पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥ १०॥
कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकावभासो
वेदाक्षमालावरदाभयाङ्कः ।
त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः
सद्योऽधिजातोऽवतु मां प्रतीच्याम् ॥ ११॥
वराक्षमालाभयटङ्कहस्तः
सरोजकिञ्जल्कसमानवर्णः ।
त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां
पायादुदीच्यां दिशि वामदेवः ॥ १२॥
वेदाभयेष्टाङ्कुशटङ्कपाश-
कपालढक्काक्षरशूलपाणिः ।
सितद्युतिः पञ्चमुखोऽवतान्मां
ईशान ऊर्ध्वं परमप्रकाशः ॥ १३॥
मूर्धानमव्यान्मम चन्द्रमौलि-
र्भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः ।
नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी
नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥ १४॥
पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्तिः
कपोलमव्यात्सततं कपाली ।
वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो
जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वः ॥ १५॥
कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठः
पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः ।
दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहु-
र्वक्षःस्थलं दक्षमखान्तकोऽव्यात् ॥ १६॥
ममोदरं पातु गिरीन्द्रधन्वा
मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी ।
हेरम्बतातो मम पातु नाभिं
पायात्कटिं धूर्जटिरीश्वरो मे ॥ १७॥
ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो
जानुद्वयं मे जगदीश्वरोऽव्यात् ।
जङ्घायुगं पुङ्गवकेतुरव्यात्
पादौ ममाव्यात्सुरवन्द्यपादः ॥ १८॥
महेश्वरः पातु दिनादियामे
मां मध्ययामेऽवतु वामदेवः ।
त्रिलोचनः पातु तृतीययामे
वृषध्वजः पातु दिनान्त्ययामे ॥ २०॥
पायान्निशादौ शशिशेखरो मां
गङ्गाधरो रक्षतु मां निशीथे ।
गौरीपतिः पातु निशावसाने
मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ॥ २१॥
अन्तःस्थितं रक्षतु शंकरो मां
स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थितं माम् ।
तदन्तरे पातु पतिः पशूनां
सदाशिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥ २२॥
तिष्ठन्तमव्याद् भुवनैकनाथः
पायाद्व्रजन्तं प्रमथाधिनाथः ।
वेदान्तवेद्योऽवतु मां निषण्णं
मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥ २३॥
मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्ठः
शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारिः ।
अरण्यवासादि महाप्रवासे
पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः ॥ २४॥
कल्पान्तकालोग्रपटुप्रकोप-
स्फुटाट्टहासोच्चलिताण्डकोशः ।
घोरारिसेनार्णवदुर्निवार-
महाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः ॥ २५॥
पत्त्यश्वमातङ्गरथावरूथिनी-
सहस्रलक्षायुत कोटिभीषणम् ।
अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां
छिन्द्यान्मृडो घोरक्ठार धारया ॥ २६॥
निहन्तु दस्यून्प्रलयानलार्चिर्-
ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरान्तकस्य ।
शार्दूलसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान्
संत्रासयत्वीशधनुः पिनाकः ॥ २७॥
दुःस्वप्नदुःशकुनदुर्गतिदौर्मनस्य-
दुर्भिक्षदुर्व्यसनदुःसहदुर्यशांसि ।
उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्तिं
व्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीशः ॥ २८॥

ॐ नमो भगवते सदाशिवाय
सकलतत्वात्मकाय
सर्वमन्त्रस्वरूपाय
सर्वयन्त्राधिष्ठिताय
सर्वतन्त्रस्वरूपाय
सर्वतत्वविदूराय
ब्रह्मरुद्रावतारिणे
नीलकण्ठाय
पार्वतीमनोहरप्रियाय
सोमसूर्याग्निलोचनाय
भस्मोद्धूलितविग्रहाय
महामणि मुकुटधारणाय
माणिक्यभूषणाय
सृष्टिस्थितिप्रलयकाल-
रौद्रावताराय
दक्षाध्वरध्वंसकाय
महाकालभेदनाय
मूलधारैकनिलयाय
तत्वातीताय
गंगाधराय
सर्वदेवादिदेवाय
षडाश्रयाय
वेदान्तसाराय
त्रिवर्गसाधनाय
अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकाय
अनन्त वासुकि तक्षक-
कर्कोटक शङ्ख कुलिक-
पद्म महापद्मेति-
अष्टमहानागकुलभूषणाय
प्रणवस्वरूपाय
चिदाकाशाय
आकाश दिक् स्वरूपाय
ग्रहनक्षत्रमालिने
सकलाय
कलङ्करहिताय
सकललोकैककर्त्रे
सकललोकैकभर्त्रे
सकललोकैकसंहर्त्रे
सकललोकैकगुरवे
सकललोकैकसाक्षिणे
सकलनिगमगुह्याय
सकलवेदान्तपारगाय
सकललोकैकवरप्रदाय
सकललोकैकशंकराय
सकलदुरितार्तिभञ्जनाय
सकलजगदभयंकराय
शशाङ्कशेखराय
शाश्वतनिजावासाय
निराकाराय
निराभासाय
निरामयाय
निर्मलाय
निर्मदाय
निश्चिन्ताय
निरहंकाराय
निरंकुशाय
निष्कलङ्काय
निर्गुणाय
निष्कामाय
निरूपप्लवाय
निरुपद्रवाय
निरवद्याय
निरन्तराय
निष्कारणाय
निरातंकाय
निष्प्रपञ्चाय
निस्सङ्गाय
निर्द्वन्द्वाय
निराधाराय
नीरागाय
निष्क्रोधाय
निर्लोपाय
निष्पापाय
निर्भयाय
निर्विकल्पाय
निर्भेदाय
निष्क्रियाय
निस्तुलाय
निःसंशयाय
निरंजनाय
निरुपमविभवाय
नित्यशुद्धबुद्धमुक्तपरिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय
परमशान्तस्वरूपाय
परमशान्तप्रकाशाय
तेजोरूपाय
तेजोमयाय
तेजोऽधिपतये
जय जय रुद्र
महारुद्र
महारौद्र
भद्रावतार
महाभैरव
कालभैरव
कल्पान्तभैरव
कपालमालाधर
खट्वाङ्ग चर्मखड्गधर पाशाङ्कुश-
डमरूशूल चापबाणगदाशक्तिभिंदिपाल-
तोमर मुसल मुद्गर पाश परिघ-
भुशुण्डी शतघ्नी चक्राद्यायुधभीषणाकार-
सहस्रमुखदंष्ट्राकरालवदन
विकटाट्टहास विस्फारित ब्रह्माण्डमण्डल
नागेन्द्रकुण्डल
नागेन्द्रहार
नागेन्द्रवलय
नागेन्द्रचर्मधर
नागेन्द्रनिकेतन
मृत्युञ्जय
त्र्यम्बक
त्रिपुरान्तक
विश्वरूप
विरूपाक्ष
विश्वेश्वर
वृषभवाहन
विषविभूषण
विश्वतोमुख
सर्वतोमुख
मां रक्ष रक्ष
ज्वलज्वल
प्रज्वल प्रज्वल
महामृत्युभयं शमय शमय
अपमृत्युभयं नाशय नाशय
रोगभयं उत्सादयोत्सादय
विषसर्पभयं शमय शमय
चोरान् मारय मारय
मम शत्रून् उच्चाटयोच्चाटय
त्रिशूलेन विदारय विदारय
कुठारेण भिन्धि भिन्धि
खड्गेन छिन्द्दि छिन्द्दि
मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय
बाणैः संताडय संताडय
यक्ष रक्षांसि भीषय भीषय
अशेष भूतान् विद्रावय विद्रावय
कूष्माण्डभूतवेतालमारीगण-
ब्रह्मराक्षसगणान् संत्रासय संत्रासय
मम अभयं कुरु कुरु
मम पापं शोधय शोधय
वित्रस्तं मां आश्वासय आश्वासय
नरकमहाभयान् मां उद्धर उद्धर
अमृतकटाक्षवीक्षणेन मां-
आलोकय आलोकय संजीवय संजीवय
क्षुत्तृष्णार्तं मां आप्यायय आप्यायय
दुःखातुरं मां आनन्दय आनन्दय
शिवकवचेन मां आच्छादय आच्छादय
हर हर मृत्युंजय त्र्यम्बक सदाशिव
परमशिव नमस्ते नमस्ते नमः ॥

ऋषभ उवाच —
इत्येतत्परमं शैवं कवचं व्याहृतं मया ।
सर्व बाधा प्रशमनं रहस्यं सर्व देहिनाम् ॥ १॥
यः सदा धारयेन्मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम् ।
न तस्य जायते कापि भयं शम्भोरनुग्रहात् ॥ २॥
क्षीणायुः प्राप्तमृत्युर्वा महारोगहतोऽपि वा ।
सद्यः सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्च विन्दति ॥ ३॥
सर्वदारिद्रयशमनं सौमाङ्गल्यविवर्धनम् ।
यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते ॥ ४॥
महापातकसङ्घातैर्मुच्यते चोपपातकैः ।
देहान्ते मुक्तिमाप्नोति शिववर्मानुभावतः ॥ ५॥
त्वमपि श्रद्दया वत्स शैवं कवचमुत्तमम् ।
धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥ ६॥

श्रीसूत उवाच —
इत्युक्त्वा ऋषभो योगी तस्मै पार्थिव सूनवे ।
ददौ शङ्खं महारावं खड्गं च अरिनिषूदनम् ॥ ७॥
पुनश्च भस्म संमंत्र्य तदङ्गं परितोऽस्पृशत् ।
गजानां षट्सहस्रस्य त्रिगुणस्य बलं ददौ ॥ ८॥
भस्मप्रभावात् सम्प्राप्तबलैश्वर्य धृति स्मृतिः ।
स राजपुत्रः शुशुभे शरदर्क इव श्रिया ॥ ९॥
तमाह प्राञ्जलिं भूयः स योगी नृपनन्दनम् ।
एष खड्गो मया दत्तस्तपोमन्त्रानुभावतः ॥ १०॥
शितधारमिमं खड्गं यस्मै दर्शयसे स्फुटम् ।
स सद्यो म्रियते शत्रुः साक्षान्मृत्युरपि स्वयम् ॥ ११॥
अस्य शङ्खस्य निर्ह्रादं ये शृण्वन्ति तवाहिताः ।
ते मूर्च्छिताः पतिष्यन्ति न्यस्तशस्त्रा विचेतनाः ॥ १२॥
खड्गशङ्खाविमौ दिव्यौ परसैन्यविनाशकौ ।
आत्मसैन्यस्वपक्षाणां शौर्यतेजोविवर्धनौ ॥ १३॥
एतयोश्च प्रभावेन शैवेन कवचेन च ।
द्विषट्सहस्र नागानां बलेन महतापि च ॥ १४॥
भस्मधारण सामर्थ्याच्छत्रुसैन्यं विजेष्यसे ।
प्राप्य सिंहासनं पित्र्यं गोप्ताऽसि पृथिवीमिमाम् ॥ १५॥
इति भद्रायुषं सम्यगनुशास्य समातृकम् ।
ताभ्यां सम्पूजितः सोऽथ योगी स्वैरगतिर्ययौ ॥ १६॥
॥ इति श्रीस्कन्दमहापुराणे ब्रह्मोत्तरखण्डे शिवकवच
प्रभाव वर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥


करन्यासः
ओं सदाशिवाय अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
नं गंगाधराय तर्जनीभ्यां नमः ।
मं मृत्युञ्जयाय मध्यमाभ्यां नमः ।
शिं शूलपाणये अनामिकाभ्यां नमः ।
वां पिनाकपाणये कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
यं उमापतये करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादि अंगन्यासः
ओं सदाशिवाय हृदयाय नमः ।
नं गंगाधराय शिरसे स्वाहा ।
मं मृत्युञ्जयाय शिखायै वषट् ।
शिं शूलपाणये कवचाय हुम् ।
वां पिनाकपाणये नेत्रत्रयाय वौषट् ।
यं उमापतये अस्त्राय फट् ।
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥

ध्यानम्
वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं कालकण्ठ मरिंदमम् ।
सहस्रकरमत्युग्रं वन्दे शम्भुं उमापतिम् ॥
रुद्राक्षकङ्कणलसत्करदण्डयुग्मः
पालान्तरालसितभस्मधृतत्रिपुण्ड्रः ।
पञ्चाक्षरं परिपठन् वरमन्त्रराजं
ध्यायन् सदा पशुपतिं शरणं व्रजेथाः ॥
अतः परं सर्वपुराणगुह्यं
निःशेषपापौघहरं पवित्रम् ।
जयप्रदं सर्वविपत्प्रमोचनं
वक्ष्यामि शैवम् कवचं हिताय ते ॥

पञ्चपूजा
लं पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि ।
हं आकाशात्मने पुष्पैः पूजयामि ।
यं वाय्वात्मने धूपम् आघ्रापयामि ।
रं अग्न्यात्मने दीपं दर्शयामि ।
वं अमृतात्मने अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि ।
सं सर्वात्मने सर्वोपचारपूजां समर्पयामि ॥
ऋषभ उवाच —
नमस्कृत्य महादेवं विश्वव्यापिनमीश्वरम् ।
वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥ १॥
शुचौ देशे समासीनो यथावत्कल्पितासनः ।
जितेन्द्रियो जितप्राणश्चिन्तयेच्छिवमव्ययम् ॥ २॥
हृत्पुण्डरीकान्तरसन्निविष्टं
स्वतेजसा व्याप्तनभोऽवकाशम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममनन्तमाद्यं
ध्यायेत् परानन्दमयं महेशम् ॥ ३॥
ध्यानावधूताखिलकर्मबन्ध-
श्चिरं चिदानन्दनिमग्नचेताः ।
षडक्षरन्यास समाहितात्मा
शैवेन कुर्यात्कवचेन रक्षाम् ॥ ४॥
मां पातु देवोऽखिलदेवतात्मा
संसारकूपे पतितं गभीरे ।
तन्नाम दिव्यं परमन्त्रमूलं
धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम् ॥ ५॥
सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्ति-
र्ज्योतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा ।
अणोरणीयानुरुशक्तिरेकः
स ईश्वरः पातु भयादशेषात् ॥ ६॥
यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं
पायात्स भूमेर्गिरिशोऽष्टमूर्तिः ।
योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति
संजीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥ ७॥
कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा
सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः ।
स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्ने-
र्वात्यादिभीतेरखिलाच्च तापात् ॥ ८॥
प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो
विद्यावराभीतिकुठारपाणिः ।
चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः
प्राच्यां स्थितो रक्षतु मामजस्रम् ॥ ९॥
कुठारखेटाङ्कुशशूलढक्का-
कपालपाशाक्षगुणान्दधानः ।
चतुर्मुखो नीलरुचिस्त्रिनेत्रः
पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥ १०॥
कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकावभासो
वेदाक्षमालावरदाभयाङ्कः ।
त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः
सद्योऽधिजातोऽवतु मां प्रतीच्याम् ॥ ११॥
वराक्षमालाभयटङ्कहस्तः
सरोजकिञ्जल्कसमानवर्णः ।
त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां
पायादुदीच्यां दिशि वामदेवः ॥ १२॥
वेदाभयेष्टाङ्कुशटङ्कपाश-
कपालढक्काक्षरशूलपाणिः ।
सितद्युतिः पञ्चमुखोऽवतान्मां
ईशान ऊर्ध्वं परमप्रकाशः ॥ १३॥
मूर्धानमव्यान्मम चन्द्रमौलि-
र्भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः ।
नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी
नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥ १४॥
पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्तिः
कपोलमव्यात्सततं कपाली ।
वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो
जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वः ॥ १५॥
कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठः
पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः ।
दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहु-
र्वक्षःस्थलं दक्षमखान्तकोऽव्यात् ॥ १६॥
ममोदरं पातु गिरीन्द्रधन्वा
मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी ।
हेरम्बतातो मम पातु नाभिं
पायात्कटिं धूर्जटिरीश्वरो मे ॥ १७॥
ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो
जानुद्वयं मे जगदीश्वरोऽव्यात् ।
जङ्घायुगं पुङ्गवकेतुरव्यात्
पादौ ममाव्यात्सुरवन्द्यपादः ॥ १८॥
महेश्वरः पातु दिनादियामे
मां मध्ययामेऽवतु वामदेवः ।
त्रिलोचनः पातु तृतीययामे
वृषध्वजः पातु दिनान्त्ययामे ॥ २०॥
पायान्निशादौ शशिशेखरो मां
गङ्गाधरो रक्षतु मां निशीथे ।
गौरीपतिः पातु निशावसाने
मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ॥ २१॥
अन्तःस्थितं रक्षतु शंकरो मां
स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थितं माम् ।
तदन्तरे पातु पतिः पशूनां
सदाशिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥ २२॥
तिष्ठन्तमव्याद् भुवनैकनाथः
पायाद्व्रजन्तं प्रमथाधिनाथः ।
वेदान्तवेद्योऽवतु मां निषण्णं
मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥ २३॥
मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्ठः
शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारिः ।
अरण्यवासादि महाप्रवासे
पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः ॥ २४॥
कल्पान्तकालोग्रपटुप्रकोप-
स्फुटाट्टहासोच्चलिताण्डकोशः ।
घोरारिसेनार्णवदुर्निवार-
महाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः ॥ २५॥
पत्त्यश्वमातङ्गरथावरूथिनी-
सहस्रलक्षायुत कोटिभीषणम् ।
अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां
छिन्द्यान्मृडो घोरक्ठार धारया ॥ २६॥
निहन्तु दस्यून्प्रलयानलार्चिर्-
ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरान्तकस्य ।
शार्दूलसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान्
संत्रासयत्वीशधनुः पिनाकः ॥ २७॥
दुःस्वप्नदुःशकुनदुर्गतिदौर्मनस्य-
दुर्भिक्षदुर्व्यसनदुःसहदुर्यशांसि ।
उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्तिं
व्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीशः ॥ २८॥

ॐ नमो भगवते सदाशिवाय
सकलतत्वात्मकाय
सर्वमन्त्रस्वरूपाय
सर्वयन्त्राधिष्ठिताय
सर्वतन्त्रस्वरूपाय
सर्वतत्वविदूराय
ब्रह्मरुद्रावतारिणे
नीलकण्ठाय
पार्वतीमनोहरप्रियाय
सोमसूर्याग्निलोचनाय
भस्मोद्धूलितविग्रहाय
महामणि मुकुटधारणाय
माणिक्यभूषणाय
सृष्टिस्थितिप्रलयकाल-
रौद्रावताराय
दक्षाध्वरध्वंसकाय
महाकालभेदनाय
मूलधारैकनिलयाय
तत्वातीताय
गंगाधराय
सर्वदेवादिदेवाय
षडाश्रयाय
वेदान्तसाराय
त्रिवर्गसाधनाय
अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकाय
अनन्त वासुकि तक्षक-
कर्कोटक शङ्ख कुलिक-
पद्म महापद्मेति-
अष्टमहानागकुलभूषणाय
प्रणवस्वरूपाय
चिदाकाशाय
आकाश दिक् स्वरूपाय
ग्रहनक्षत्रमालिने
सकलाय
कलङ्करहिताय
सकललोकैककर्त्रे
सकललोकैकभर्त्रे
सकललोकैकसंहर्त्रे
सकललोकैकगुरवे
सकललोकैकसाक्षिणे
सकलनिगमगुह्याय
सकलवेदान्तपारगाय
सकललोकैकवरप्रदाय
सकललोकैकशंकराय
सकलदुरितार्तिभञ्जनाय
सकलजगदभयंकराय
शशाङ्कशेखराय
शाश्वतनिजावासाय
निराकाराय
निराभासाय
निरामयाय
निर्मलाय
निर्मदाय
निश्चिन्ताय
निरहंकाराय
निरंकुशाय
निष्कलङ्काय
निर्गुणाय
निष्कामाय
निरूपप्लवाय
निरुपद्रवाय
निरवद्याय
निरन्तराय
निष्कारणाय
निरातंकाय
निष्प्रपञ्चाय
निस्सङ्गाय
निर्द्वन्द्वाय
निराधाराय
नीरागाय
निष्क्रोधाय
निर्लोपाय
निष्पापाय
निर्भयाय
निर्विकल्पाय
निर्भेदाय
निष्क्रियाय
निस्तुलाय
निःसंशयाय
निरंजनाय
निरुपमविभवाय
नित्यशुद्धबुद्धमुक्तपरिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय
परमशान्तस्वरूपाय
परमशान्तप्रकाशाय
तेजोरूपाय
तेजोमयाय
तेजोऽधिपतये
जय जय रुद्र
महारुद्र
महारौद्र
भद्रावतार
महाभैरव
कालभैरव
कल्पान्तभैरव
कपालमालाधर
खट्वाङ्ग चर्मखड्गधर पाशाङ्कुश-
डमरूशूल चापबाणगदाशक्तिभिंदिपाल-
तोमर मुसल मुद्गर पाश परिघ-
भुशुण्डी शतघ्नी चक्राद्यायुधभीषणाकार-
सहस्रमुखदंष्ट्राकरालवदन
विकटाट्टहास विस्फारित ब्रह्माण्डमण्डल
नागेन्द्रकुण्डल
नागेन्द्रहार
नागेन्द्रवलय
नागेन्द्रचर्मधर
नागेन्द्रनिकेतन
मृत्युञ्जय
त्र्यम्बक
त्रिपुरान्तक
विश्वरूप
विरूपाक्ष
विश्वेश्वर
वृषभवाहन
विषविभूषण
विश्वतोमुख
सर्वतोमुख
मां रक्ष रक्ष
ज्वलज्वल
प्रज्वल प्रज्वल
महामृत्युभयं शमय शमय
अपमृत्युभयं नाशय नाशय
रोगभयं उत्सादयोत्सादय
विषसर्पभयं शमय शमय
चोरान् मारय मारय
मम शत्रून् उच्चाटयोच्चाटय
त्रिशूलेन विदारय विदारय
कुठारेण भिन्धि भिन्धि
खड्गेन छिन्द्दि छिन्द्दि
मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय
बाणैः संताडय संताडय
यक्ष रक्षांसि भीषय भीषय
अशेष भूतान् विद्रावय विद्रावय
कूष्माण्डभूतवेतालमारीगण-
ब्रह्मराक्षसगणान् संत्रासय संत्रासय
मम अभयं कुरु कुरु
मम पापं शोधय शोधय
वित्रस्तं मां आश्वासय आश्वासय
नरकमहाभयान् मां उद्धर उद्धर
अमृतकटाक्षवीक्षणेन मां-
आलोकय आलोकय संजीवय संजीवय
क्षुत्तृष्णार्तं मां आप्यायय आप्यायय
दुःखातुरं मां आनन्दय आनन्दय
शिवकवचेन मां आच्छादय आच्छादय
हर हर मृत्युंजय त्र्यम्बक सदाशिव
परमशिव नमस्ते नमस्ते नमः ॥

ऋषभ उवाच —
इत्येतत्परमं शैवं कवचं व्याहृतं मया ।
सर्व बाधा प्रशमनं रहस्यं सर्व देहिनाम् ॥ १॥
यः सदा धारयेन्मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम् ।
न तस्य जायते कापि भयं शम्भोरनुग्रहात् ॥ २॥
क्षीणायुः प्राप्तमृत्युर्वा महारोगहतोऽपि वा ।
सद्यः सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्च विन्दति ॥ ३॥
सर्वदारिद्रयशमनं सौमाङ्गल्यविवर्धनम् ।
यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते ॥ ४॥
महापातकसङ्घातैर्मुच्यते चोपपातकैः ।
देहान्ते मुक्तिमाप्नोति शिववर्मानुभावतः ॥ ५॥
त्वमपि श्रद्दया वत्स शैवं कवचमुत्तमम् ।
धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥ ६॥

श्रीसूत उवाच —
इत्युक्त्वा ऋषभो योगी तस्मै पार्थिव सूनवे ।
ददौ शङ्खं महारावं खड्गं च अरिनिषूदनम् ॥ ७॥
पुनश्च भस्म संमंत्र्य तदङ्गं परितोऽस्पृशत् ।
गजानां षट्सहस्रस्य त्रिगुणस्य बलं ददौ ॥ ८॥
भस्मप्रभावात् सम्प्राप्तबलैश्वर्य धृति स्मृतिः ।
स राजपुत्रः शुशुभे शरदर्क इव श्रिया ॥ ९॥
तमाह प्राञ्जलिं भूयः स योगी नृपनन्दनम् ।
एष खड्गो मया दत्तस्तपोमन्त्रानुभावतः ॥ १०॥
शितधारमिमं खड्गं यस्मै दर्शयसे स्फुटम् ।
स सद्यो म्रियते शत्रुः साक्षान्मृत्युरपि स्वयम् ॥ ११॥
अस्य शङ्खस्य निर्ह्रादं ये शृण्वन्ति तवाहिताः ।
ते मूर्च्छिताः पतिष्यन्ति न्यस्तशस्त्रा विचेतनाः ॥ १२॥
खड्गशङ्खाविमौ दिव्यौ परसैन्यविनाशकौ ।
आत्मसैन्यस्वपक्षाणां शौर्यतेजोविवर्धनौ ॥ १३॥
एतयोश्च प्रभावेन शैवेन कवचेन च ।
द्विषट्सहस्र नागानां बलेन महतापि च ॥ १४॥
भस्मधारण सामर्थ्याच्छत्रुसैन्यं विजेष्यसे ।
प्राप्य सिंहासनं पित्र्यं गोप्ताऽसि पृथिवीमिमाम् ॥ १५॥
इति भद्रायुषं सम्यगनुशास्य समातृकम् ।
ताभ्यां सम्पूजितः सोऽथ योगी स्वैरगतिर्ययौ ॥ १६॥
॥ इति श्रीस्कन्दमहापुराणे ब्रह्मोत्तरखण्डे शिवकवच
प्रभाव वर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥

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शनि कवच हिंदी में

Shani Kavach in Hindi

शनि कवच

अथ श्री शनिकवचम्

अस्य श्री शनैश्चरकवचस्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषिः ||
अनुष्टुप् छन्दः || शनैश्चरो देवता || शीं शक्तिः ||
शूं कीलकम् || शनैश्चरप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ||
निलांबरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् ||
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः || १ ||

||ब्रह्मोवाच ||

श्रुणूध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् |
कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् || २ ||
कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् |
शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् || ३ ||
ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनंदनः |
नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कर्णौ यमानुजः || ४ ||
नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा |
स्निग्धकंठःश्च मे कंठं भुजौ पातु महाभुजः || ५ ||
स्कंधौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रदः |
वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितत्सथा || ६ ||
नाभिं ग्रहपतिः पातु मंदः पातु कटिं तथा |
ऊरू ममांतकः पातु यमो जानुयुगं तथा || ७ ||
पादौ मंदगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः |
अङ्गोपाङ्गानि सर्वाणि रक्षेन्मे सूर्यनंदनः || ८ ||
इत्येतत्कवचं दिव्यं पठेत्सूर्यसुतस्य यः |
न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः || ९ ||
व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोSपि वा |
कलत्रस्थो गतो वापि सुप्रीतस्तु सदा शनिः || १० ||
अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे |
कवचं पठतो नित्यं न पीडा जायते क्वचित् || ११ ||
इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यनिर्मितं पुरा |
द्वादशाष्टमजन्मस्थदोषान्नाशायते सदा |
जन्मलग्नास्थितान्दोषान्सर्वान्नाशयते प्रभुः || १२ ||
|| इति श्रीब्रह्मांडपुराणे ब्रह्म–नारदसंवादे शनैश्चरकवचं संपूर्णं ||

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सूर्य कवच – हिंदी

Surya Kavach in Hindi

सूर्य कवच

श्शणुष्व मुनिशार्दूल! सूर्यस्य कवचं शुभम्।
शरीरारोग्यदं दिव्यं सर्वसौभाग्यदायकम्॥
देदीप्यमान मुकुटं स्फुन्मकरकुण्डलम्।
ध्यात्वा सहस्र किरणं स्तोत्रमेतदुदीरयेत्॥
शिरो मे भास्कर: पातु ललाटं मेदमितद्युति:।
नेत्रे दिनमणि: पातु श्रवणे वासरेश्वर:॥
घ्राणां धर्मघ्शणि: पातु वदनं वेदवाहन:।
द्धह्लह्नां मे मानद: पातु कण्ठं मे सुरवन्दित:॥
स्कन्धौ प्रभाकर: पातु वक्ष: पातु जनप्रिय:।
पातु पादौ द्वादशात्मा सर्वांगसकलेश्वर:॥
सूर्यरक्षात्मकं स्तोत्रं लिखित्वा भुर्जपत्रके।
दधातिय: करैरस्य वशगा सर्वसिध्दय:॥
सुस्नातो यो जपेत् सम्यग् योदधीते स्वस्थमानस:।
स रोग मुक्तो दीर्घायु: सुख पुष्टिं च वन्दति॥

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लक्ष्मी कवच हिंदी में

Lakshmi Kavach – Hindi

लक्ष्मी कवच

श्री गणेशाय नमः ।
अस्य श्रीमहालक्ष्मीकवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दः
महालक्ष्मीर्देवता महालक्ष्मीप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
इन्द्र उवाच । समस्तकवचानां तु तेजस्वि कवचोत्तमम् ।
आत्मरक्षणमारोग्यं सत्यं त्वं ब्रूहि गीष्पते ॥ १॥

श्रीगुरुरुवाच । महालक्ष्म्यास्तु कवचं प्रवक्ष्यामि समासतः ।
चतुर्दशसु लोकेषु रहस्यं ब्रह्मणोदितम् ॥ २॥

ब्रह्मोवाच । शिरो मे विष्णुपत्नी च ललाटममृतोद्भवा ।
चक्षुषी सुविशालाक्षी श्रवणे सागराम्बुजा ॥ ३॥

घ्राणं पातु वरारोहा जिह्वामाम्नायरूपिणी ।
मुखं पातु महालक्ष्मीः कण्ठं वैकुण्ठवासिनी ॥ ४॥

स्कन्धौ मे जानकी पातु भुजौ भार्गवनन्दिनी ।
बाहू द्वौ द्रविणी पातु करौ हरिवराङ्गना ॥ ५॥

वक्षः पातु च श्रीर्देवी हृदयं हरिसुन्दरी ।
कुक्षिं च वैष्णवी पातु नाभिं भुवनमातृका ॥ ६॥

कटिं च पातु वाराही सक्थिनी देवदेवता ।
ऊरू नारायणी पातु जानुनी चन्द्रसोदरी ॥ ७॥

इन्दिरा पातु जंघे मे पादौ भक्तनमस्कृता ।
नखान् तेजस्विनी पातु सर्वाङ्गं करूणामयी ॥ ८॥

ब्रह्मणा लोकरक्षार्थं निर्मितं कवचं श्रियः ।
ये पठन्ति महात्मानस्ते च धन्या जगत्त्रये ॥ ९॥

कवचेनावृताङ्गनां जनानां जयदा सदा ।
मातेव सर्वसुखदा भव त्वममरेश्वरी ॥ १०॥

भूयः सिद्धिमवाप्नोति पूर्वोक्तं ब्रह्मणा स्वयम् ।
लक्ष्मीर्हरिप्रिया पद्मा एतन्नामत्रयं स्मरन् ॥ ११॥

नामत्रयमिदं जप्त्वा स याति परमां श्रियम् ।
यः पठेत्स च धर्मात्मा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ १२॥

॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे इन्द्रोपदिष्टं महालक्ष्मीकवचं सम्पूर्णम् ॥

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श्री गणेश कवच – हिंदी

GANESH KAVACH – HINDI

श्री गणेश कवच

एषोति चपलो दैत्यान् बाल्येपि नाशयत्यहो ।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥ १ ॥
दैत्या नानाविधा दुष्टास्साधु देवद्रुमः खलाः ।
अतोस्य कंठे किंचित्त्यं रक्षां संबद्धुमर्हसि ॥ २ ॥
ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहु माद्ये युगे
त्रेतायां तु मयूर वाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् । ई
द्वापरेतु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुम् तुर्ये
तु द्विभुजं सितांगरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ ३ ॥
विनायक श्शिखांपातु परमात्मा परात्परः ।
अतिसुंदर कायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ ४ ॥
ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः ।
नयने बालचंद्रस्तु गजास्यस्त्योष्ठ पल्लवौ ॥ ५ ॥
जिह्वां पातु गजक्रीडश्चुबुकं गिरिजासुतः ।
वाचं विनायकः पातु दंतान्‌ रक्षतु दुर्मुखः ॥ ६ ॥
श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थदः ।
गणेशस्तु मुखं पातु कंठं पातु गणाधिपः ॥ ७ ॥
स्कंधौ पातु गजस्कंधः स्तने विघ्नविनाशनः ।
हृदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ॥ ८ ॥
धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरश्शुभः ।
लिंगं गुह्यं सदा पातु वक्रतुंडो महाबलः ॥ ९ ॥
गजक्रीडो जानु जंघो ऊरू मंगलकीर्तिमान् ।
एकदंतो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदावतु ॥ १० ॥
क्षिप्र प्रसादनो बाहु पाणी आशाप्रपूरकः ।
अंगुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तो रिनाशनः ॥ ११ ॥
सर्वांगानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदावतु ।
अनुक्तमपि यत् स्थानं धूमकेतुः सदावतु ॥ १२ ॥
आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोवतु ।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ १३ ॥
दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः ।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ता व्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ १४ ॥
कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्याविशनंदनः ।
दिवाव्यादेकदंत स्तु रात्रौ संध्यासु यःविघ्नहृत् ॥ १५ ॥
राक्षसासुर बेताल ग्रह भूत पिशाचतः ।
पाशांकुशधरः पातु रजस्सत्त्वतमस्स्मृतीः ॥ १६ ॥
ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मी च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् । ई
वपुर्धनं च धान्यं च गृहं दारास्सुतान्सखीन् ॥ १७ ॥
सर्वायुध धरः पौत्रान् मयूरेशो वतात् सदा ।
कपिलो जानुकं पातु गजाश्वान् विकटोवतु ॥ १८ ॥
भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कंठे धारयेत् सुधीः ।
न भयं जायते तस्य यक्ष रक्षः पिशाचतः ॥ १९ ॥
त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसार तनुर्भवेत् ।
यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ २० ॥
युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।
मारणोच्चाटनाकर्ष स्तंभ मोहन कर्मणि ॥ २१ ॥
सप्तवारं जपेदेतद्दनानामेकविंशतिः ।
तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ २२ ॥
एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः ।
कारागृहगतं सद्यो राज्ञावध्यं च मोचयोत् ॥ २३ ॥
राजदर्शन वेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः ।
स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥ २४ ॥
इदं गणेशकवचं कश्यपेन सविरितम् ।
मुद्गलाय च ते नाथ मांडव्याय महर्षये ॥ २५ ॥
मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्व सिद्धिदम् ।
न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥ २६ ॥
अनेनास्य कृता रक्षा न बाधास्य भवेत् व्याचित् ।
राक्षसासुर बेताल दैत्य दानव संभवाः ॥ २७ ॥
॥ इति श्री गणेशपुराणे श्री गणेश कवचं संपूर्णम् ॥

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दुर्गा कवच हिंदी में

Durga Kavach in Hindi

दुर्गा कवच हिंदी में

ॐ नमश्चण्डिकायै।
॥मार्कण्डेय उवाच॥
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्य चिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
॥ब्रह्मोवाच॥
अस्ति गुह्यतमं विप्रा सर्वभूतोपकारकम्।
दिव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्वा महामुने॥२॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न ही॥७॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
श्वेतरूपधारा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढया नानारत्नोपशोभिता:॥१२॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्याः क्रोधसमाकुला:।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुद्धानीथं देवानां च हिताय वै॥१५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्रि आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खङ्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणी में रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहाना।
जाया मे चाग्रतः पातु: विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
मालाधारी ललाटे च भ्रुवो रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी ॥२३॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धारी॥२६॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चान्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुडे महिषवाहिनी॥३०॥
कट्यां भगवतीं रक्षेज्जानूनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥३१॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्रीरक्षेत्पादाध:स्तलवासिनी॥३२॥
नखान् दंष्ट्रा कराली च केशांशचैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥३५॥
शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
गोत्रामिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्षा चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मी भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवी जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
पदमेकं न गच्छेतु यदिच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यात्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सर्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रमेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।
य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रामपमृत्युविवर्जितः॥४७॥
नश्यन्ति टयाधय: सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराशचैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला॥५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भावेद्राज्यं तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥
यशसा वद्धते सोऽपी कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चणण्डीं कृत्वा तु कवचं पूरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिनयां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
देहान्ते परमं स्थानं यात्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ॐ॥ ॥५६॥
इति श्री देव्याः कवचं सम्पूर्णम्

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